
न्यूज डेस्क आगरा मीडिया ::.जयपुर। कोई भी आर्टफॉर्म वास्तव में अंतर्मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। फिल्म भी ऐसे मनोभावों को प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। फिल्म देखना भी एक विधा है। फिल्म देखते वक्त पॉपकॉर्न खाना या कोक पीना उसमें मेहनत करने वालों की तोहीन है। यहां तक कि फिल्म के अंत में जो 400 नाम आते हैं, उन्होंने भी फिल्म में अपना खून पसीना बहाया होता है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए। यह विचार जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में 10 दिवसीय फिल्म एप्रिसिएशन वर्कशॉप के समापन कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ताओं ने व्यक्त किए।
कार्यक्रम में सभी प्रतिभागियों को सर्टिफिकेट प्रदान किए गए। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जवाहर कला केंद्र की महानिदेशक किरण सोनी गुप्ता ने कहा कि कला जीवन को सुखद बनाने का एक माध्यम है। अपने भीतर मौजूद प्रतिभा को निखारने और व्यक्त करने का फ़िल्म एक बड़ा मंच है। फ़िल्म समाज के विभिन्न पहलुओं से करीब से जुड़ी होती है। उन्होंने फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स करने वालों को संबोधित करते हुए कहा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती जीवन में जब भी मौका मिले किसी भी विषय पर अध्ययन करते रहना चाहिए, क्योंकि शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती।
फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के निदेशक भूपेंद्र कैंथोला ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि फिल्मों की ओर युवा पीढ़ी का रुचि तेजी से बढ़ी है।
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